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Thursday, September 24, 2020

चीन में मुसलमानों पर बढ़े अत्याचार, मस्जिद गिरा कर बना दिया सार्वजनिक शौचालय

चीन में उइगर मुसलमानों पर अत्याचारों का सिलसिला बढ़ता जा रहा है । कई तरह की पाबंदियां लगाकर उनके मनोबल को भी...

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चाय की प्याली में उठे तूफान: भाजपा को भनक तक नहीं

नई दिल्ली/ दबंग खबर ।  ‘चाय पर चर्चा’ को भले ही पीएम नरेंद्र मोदी ने एक दिशा दी हो और लोकप्रिय बनाया हो लेकिन यह सच है कि इस देश की मिट्टी की सुंगध के साथ ही इसकी खुशबु आप हर दूर-दराज कोने पर अवस्थित चाय की दुकान पर महसूस कर सकते है जहां एक जानदार, शानदार बहस सुनने को मिल जाएगी, जो नई नहीं है। ‘चाय पर चर्चा’ के कॉपीराइट पर इस देश की आम जनता, पत्रकार, बुद्धिजीवी का पहला हक तो बनता है। तभी तो गांव से लेकर दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस जैसे जगहों पर भी इसका एक ही रंग दिखेगा। जिसका न तो कोई मजहब है और न कोई जाति है। 

लंबे समय से संघर्षरत है दिल्ली बीजेपी

एक इसी चाय पर चर्चा में एक बीजेपी नेता ने दावा किया है कि दिल्ली प्रदेश बीजेपी को जान- बूझकर केंद्रीय नेतृत्व ने ‘संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है’ वाले तर्ज पर राजधानी के सड़कों पर एक लंबी लड़ाई लड़ने के लिए छोड़ दिया है। वैसे ही जैसे किसी को सड़क हादसे पर तड़पता, चिल्लाता छोड़ दिया जाता है, जिसे दूर से जरुर लोग देखते है लेकिन पास आने से डरते है कि कहीं कोई मामला न बन जाए। इस परिस्थिति में भले ही मोदी-शाह युग में थोड़ी रणनीतिक बदलाव दिख जाए, लेकिन लंबे समय से प्रदेश बीजेपी इस घुटन के साथ जीने की आदी हो गई है।  

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कद्दावर नेता भी हुए राजनीति का शिकार
हमारे साथ बातचीत में कई सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने स्वीकारा कि जब मदन लाल खुराना जैसे जमीनी, कद्दावर नेता को सीएम बनाया गया तो महज 50,000 रुपए के हवाला आरोप पर इस्तीफा ले लिया गया, यह भरोसा देते हुए कि जैसे ही आप मिस्टर क्लीन वाली छवि ले आओगे आपको पुनः सीएम बनाया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 

बीजेपी के मॉडल पर उठता रहा है सवाल
उनके मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रहे संघर्षशील नेता साहेब सिंह वर्मा को उनकी जगह सीएम तो बनाया गया, लेकिन जब उन्हें वापस खुराना को बागडोर सौंपे जाने की बात कही गई तो उन्होंने पद छोड़ने से इनकार कर दिया। इस इनकार के पीछे भी बीजेपी के उस समय के बड़े नेता को जिम्मेदार माना जाता है। फिर जब साहिब सिंह ने पैर जमाना शुरु ही किया कि उपर से सुषमा स्वराज को सीएम बनाकर दिल्ली वालों के सामने बीजेपी ने अपना मॉडल पेश कर दिया। 

दिल्ली बीजेपी है एक प्रयोगशाला
दिल्ली वाले भी असमंजम में पड़ गए कि सिर्फ 5 साल ( 1993-1998) तक में 3 सीएम देने वाले बीजेपी को फिर से सत्ता सौंपी तो पता नहीं कि अपने प्रयोगशाला में तैयार कितने सीएम देंगे कि उनके नाम गिनने में ही कहीं अंगुली कम न पड़ जाए। जबकि आगे 15 साल में 3 बार शीला दीक्षित पर ही कांग्रेस ने भरोसा जताया। 

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अंतर्कलह से सत्ता हाथ से गंवाई
उन्होंने चाय की चुस्की लेते हुए पार्टी के दुःखती रग पर हाथ रखते हुए कहा कि जब प्रदेश बीजेपी राजधानी में मजबूत स्थिति में थी तो अंतर्कलह में डूब कर सत्ता हाथ से गंवा दी। उधर कमजोर कांग्रेस ने अपनी भीतरी अंतर्कलह को खत्म करने के लिए एक सधी चाल चली, जिसमें प्रदेश कांग्रेस के सभी वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करके शीला दीक्षित को कमान सौंप दी। कांग्रेस की प्रयोगशाला से शीला ऐसे निकली कि अगले 15 साल तक राजधानी के दिल में निर्विरोध राज करती रही। तो दूसरी तरफ बीजेपी संघर्ष में जलती रही।

कभी सत्ता के 2 केंद्र थे
फिर वो थोड़ी देर असमंजस में पड़ गए तो हमने धीरे से चाय ठंडी होने की बात कही तब उनका ध्यान टूटा और बोलते है कि दिल्ली बीजेपी को प्रयोगशाला बनाकर जानबूझकर रखा गया, इसमें कोई शक नहीं है। जब 2013 में विजय गोयल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया तो सत्ता के 2 केंद्र बना दिए। एक तरफ आक्रामक गोयल तो दूसरी तरफ सौम्य, सुशील नेता हर्षवर्धन को सीएम केंडिडेट घोषित किया। फिर से राजनीति में टकराव हुआ।

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केजरीवाल ने दिया जोरदार झटका
जब ऐसा लग रहा था कि 2013, 2015 में बीजेपी ही जोरदार वापसी करेगी तो पैरों के तले से केजरीवाल ने जमीन ही खिसका दी। बीजेपी चारों खाने चित हो गई। 2013 के दिल्ली विधानसभा में पार्टी को विजय गोयल और हर्षवर्धन के नेतृत्व में 28 सीटें मिली तो 2015 में फिर से पैराशूट पॉलिटिक्स करते हुए किरण बेदी को बागडोर थमा दिया। जिससे पार्टी मात्र 3 सीट पर सिमट कर रह गई। 

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उपराज्यपाल पार्टी से होनी चाहिए
जब हमने अन्य राज्य की तरह दिल्ली में उपराज्यपाल किसी पार्टी के नेता को नहीं सौंपे जाने के नुकसान के बारे में पूछा तो तपाक से उन्होंने कहा कि यहां भी चूक हुई है। अगर उपराज्यपाल हमारे पार्टी के होते तो इसके अनेक फायदे पार्टी को मिल सकते थे। जैसा कि अन्य राज्यों में हो रहा है। 

साथ ही उन्होंने हमें रोकते हुए कहा कि शहरी विकास मंत्री अगर किसी दिल्ली के नेता को बनाया जाता तो सीधे तौर पर कई ऐसे विकास कार्य कराये जा सकते थे जिसका सीधा असर लोगों के जनजीवन से जुड़ा हुआ है। फिर उस मंत्री को ही विधानसभा चुनाव के समय इस्तीफा दिलाकर सीएम कैंडिडेट घोषित किया जा सकता था। जिसका फायदा पार्टी को जरुर मिलता।   

केजरीवाल और कांग्रेस को निपटाने में पार्टी सक्षम

उन्होंने चाय की तारिफ करते हुए आश्चर्य प्रकट किया कि दिल्ली के किसी नेता पर विश्वास क्यों नहीं प्रकट किया जाता है। आप एक बार किसी पर भरोसा तो जताईए, पूरी कमान सौंप दिजीए तो कांग्रेस और केजरीवाल दोनों को ठिकाने लगाने के लिए पार्टी सक्षम है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस हांफ रही है तो केजरीवाल बिना पैंदी के लौटा की तरह जोर-जोर से चिल्ला रहे है, और कुछ भी नहीं।
 

बीजेपी के पास करिश्माई मोदी- शाह की जोड़ी 

उन्होंने चाय की प्याली रखते हुए कहा कि बीजेपी के पास संगठन है, मोदी- शाह का चमत्कारी नेतृत्व है, बस एक फैसला चाहिए कि किसी भी नेता को चुनकर उन्हें पूरी तरह कमान सौंप दिया जाए। आगे बस राजधानी में भगवा झंडा ही नजर आएगा, इसमें कोई शक नहीं है।  

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परिवार की तरह पार्टी की चिंता करते है कार्यकर्ता

इस पूरे बातचीत के दौरान हमने इस वरिष्ठ नेता के आंखों में कई बार पार्टी के लिए तैरता सपना, तो कहीं चिंता ठीक उसी तरह देखी जैसे एक आम व्यक्ति अपने परिवार के किसी सदस्यों की चिंता करता है। हम जब 5 साल पहले को याद करेंगे तो महसूस करेंगे कि कि 2014 के लोकसभा चुनाव में चाय पे चर्चा कार्यक्रम ने बीजेपी के चुनाव अभियान को धारदार बना दिया था। देश भर में नरेंद्र मोदी की तरफ देश कई उम्मीदों से देख रहा था।

सुझावों को नजरअंदाज नहीं करें पार्टी

 लेकिन अगर ‘चाय के प्याली में तूफान’ यानी नेताओं और कार्यकर्ता के सुझावों को नजरअंदाज करने की कोशिश होगी तो यह पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। जिसे समय रहते पार्टी को ‘टू वे’ बातचीत से हल करना होगा कि आखिर प्रदेश बीजेपी से चूक होती है या यह चूक ऊपर से थोप दी जाती है। जिसका ईमानदारी से विश्लेषण करने की जरुरत है।

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